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सरकारी अंकुश से मुक्त होंगे पेट्रोल-डीजल
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19 मई 2009
वार्ता

नई दिल्ली।
डॉ.मनमोहन सिंह के नेतृत्व में नई सरकार के जल्द ही सत्ता सम्भाल लेने के मद्देनजर मंत्रालयों में भी तैयारियां शुरू हो गई हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय पेट्रोल, डीजल के खुदरा दाम तय करने का जिम्मा तेल कम्पनियों पर छोड़ने की तैयारी कर रहा है।

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय सूत्रों के मुताबिक पेट्रोल, डीजल के खुदरा मूल्यों को एक निश्चित दायरे में घटाने अथवा बढ़ाने की जिम्मेदारी कम्पनियों को दी जा सकती है। सूत्रों के अनुसार कच्चे तेल के दाम की एक निश्चित सीमा तय कर दी जाएगी। उस दायरे में मूल्यों की घटबढ़ यदि होती है तो तेल कम्पनियां खुद ही दाम घटाने अथवा बढ़ाने का निर्णय ले सकेंगी। पेट्रोलियम मंत्रालय बार-बार दाम तय करने की जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहता है। सूत्रों के मुताबिक इस बारे में जल्द ही मंत्रिमंडल की बैठक में प्रस्ताव लाया जा सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में आशातीत उतार-चढ़ाव से तेल कम्पनियों को बीते वित्त वर्ष में 1,03,182 करोड़ रुपए का नुकसान होने का अनुमान है। सरकार को कम्पनियों के इस नुकसान की भरपाई के लिए करोड़ों रुपए के तेल बॉण्ड जारी करने पड़े। आने वाले वर्षों में उसे इनका भुगतान करना होगा, साथ ही ब्याज के रुप में भी भारी-भरकम रकम चुकानी होगी।

वर्तमान आर्थिक संकट को देखते हुए सरकार इस स्थिति से बचना चाहेगी। इसलिए पेट्रोल, डीजल के खुदरा दाम कम्पनियां अपनी लागत और मार्जिन के मुताबिक खुद ही तय करें इसकी व्यवस्था की जा रही है। हालांकि, सरकार इस बात का भी ध्यान रखेगी कि आम जनता पर अनावश्यक ज्यादा बोझ न पड़े।

सरकार ने समय-समय पर पेट्रोलियम क्षेत्र के बारे में सुझाव देने के लिए जितनी भी विशेषज्ञ समितियां बिठाई हैं, सभी ने पेट्रोल, डीजल के खुदरा मूल्य सरकारी नियंत्रण से हटाने की सिफारिश की जबकि रसोई गैस और मिट्टी तेल की सस्ती आपूर्ति केवल जरुरतमंद तबके तक ही सीमित रखने का सुझाव दिया।

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम नीचे आने के बाद फिलहाल कुछ मजबूती में हैं। ताजा स्थिति में भी तेल कम्पनियों को पेट्रोल की बिक्री पर 1.70 रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है। हालांकि डीजल की बिक्री में प्रति लीटर 30 पैसे का फायदा है जबकि राशन में मिलने वाले मिट्टी तेल पर 11.80 रुपए लीटर और रसोई गैस के घरेलू सिलेंडर पर करीब 90 रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

तेल कम्पनियां पिछले साल से ही काफी दबाव में काम कर रही हैं। उनका रिफाइनरी मार्जिन भी काफी कम हो गया है। पेट्रोल, डीजल की भारी नुकसान में बिक्री कर माल की आपूर्ति बनाए रखने के लिए उन्होंने काफी कर्ज भी लिया। डॉलर-रुपया विनिमय दर में फेरबदल से भी उनकी मुश्किलें बढ़ी हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के जो सौदे उन्होंने महंगे दाम पर किए थे उसकी सुपुर्दगी होने तक उसका दाम काफी नीचे आ गया और कम्पनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

बहरहाल, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की कमान जिसके हाथ में भी आए उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र की नवरत्न तेल कम्पनियों की वित्तीय स्थिति पर गौर करना होगा। तेल कम्पनियां जल्द ही अपने सालाना परिणाम घोषित करने जा रही हैं। इससे उनकी वित्तीय स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।


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