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पाकिस्तान: राष्ट्रपति जरदारी के लिए नई मुश्किल
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03 नवंबर 2009
वार्ता
इस्लामाबाद। पाकिस्तान सरकार ने सत्तारूढ़ गठबंधन दलों और विपक्षी पार्टियों के कड़े विरोध के बाद ‘राष्ट्रीय मेल-मिलाप विधेयक’ (एनआरओ) को संसद में पेश नहीं करने का फैसला किया है।
इस फैसले से राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की स्थिति गड़बड़ा गई है और आगे चलकर यह उनके पद से हटने की वजह भी बन सकती है।
ज्ञातव्य है कि वर्ष 2007 में पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत बेनजीर के साथ एक सत्ता बंटवारा समझौते के तहत ‘राष्ट्रीय मेल-मिलाप अध्यादेश’ पारित किया था, लेकिन जुलाई में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि इस विधेयक को कानून बनाने के लिए पाकिस्तानी संसद ‘नेशनल असेंबली’ से पारित कराना होगा।
इस अध्यादेश के बाद श्रीमती भुट्टो और श्री जरदारी के पर चल रहे भ्रष्टाचार से संबंधित मुकदमों को वापस ले लिया गया था। इस संबंध में श्री जरदारी को कई वर्षों तक जेल में रहना पड़ा। हालांकि श्री जरदारी ने अपनी सफाई में कहा है कि ये सभी आरोप राजनीति से प्रेरित थे।
पाकिस्तानी राष्ट्रपति के प्रवक्ता फरहतुल्लाह बाबर ने कल देर रात घोषणा की कि सत्तारूढ़ पार्टी के सांसदों ने एक बैठक के बाद इस विवादास्पद एनआरओ विधेयक को संसद के समक्ष नहीं पेश करने का फैसला किया है। उन्होंने इस विधेयक के कानून नहीं बन पाने के बाद एनआरओ अध्यादेश के तहत वापस लिए गए मामलों के विषय में कुछ नहीं कहा।
पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने सत्तारूढ़ गठबंधन के दलों से बैठक के बाद अपने निकट सहयोगियों से इस विषय पर चर्चा की। इस चर्चा के बाद श्री जरदारी ने नेशनल असेंबली के रुख को भांपकर एनआरओ विधेयक को पेश नहीं करने का फैसला किया।
इससे पहले सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) ने भी इस विधेयक का खुलकर विरोध किया था। उसने कहा कि इस विधेयक का समर्थन करने का अर्थ है कि भ्रष्टाचार को कानूनी मान्यता देना। श्री जरदारी की पार्टी ‘पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी’ नेशनल असेंबली में अल्पमत में है और एमक्यूएम तथा अन्य दलों की सहायता से सरकार चला रही है।
श्री जरदारी द्वारा एनआरओ विधेयक नहीं पेश करने का फैसला उनकी एक और हार माना जा रहा है। इससे पहले भी उन्हें अपने कई फैसलों पर मुंह की खानी पड़ी थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस घटनाक्रम ने श्री जरदारी को कमजोर किया है और उनके समर्थकों और विपक्षी दलों द्वारा एनआरओ विधेयक का विरोध करने से वे अलग-थलग पड़ गए हैं और आगे चलकर उन्हें इस्तीफा भी देना पड़ सकता है।
गौरतलब है कि दो दिन पहले एमक्यूएम प्रमुख अल्ताफ हुसैन ने श्री जरदारी को इस्तीफा देने की सलाह दी थी।
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