07 नवम्बर 2008
वार्ता
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने कहा है कि साहित्य का भले ही तात्कालिक एवं प्रत्यक्ष प्रभाव न पड़ता हो, पर उसका दूरगामी असर होता है। डॉ. सिंह ने आज यहां कश्मीरी के यशस्वी कवि रहमान राही को संसद भवन परिसर में स्थित बालयोगी सभागार में 40 वें ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान करते हुए यह बात कही।
83 वर्षीय श्री राही को भारतीय भाषा में उत्कृष्ट योगदान के लिए वर्ष 2004 का ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया। प्रधानमंत्री ने श्री राही को पुरस्कार में पांच लाख रुपए का ड्राफ्ट, वाग्देवी को कांस्य प्रतिमा तथा एक प्रशस्ति पत्र प्रदान किया और उन्हें शाल ओढ़ाकर सम्मानित भी किया।
बढ़ रहा है उर्दू लेखिकाओं का दायरा श्री राही ने इस मौके पर प्रधानमंत्री को अपना एक कविता संग्रह भी भेंट किया।
इस अवसर पर डॉ. सिंह ने कहा कि साहित्य क्रांति का सूत्रपात करता है और समाज में ज्ञान की लौ भी जलाता है। उन्होंने कहा कि साहित्य मनुष्य की रचनात्मकता की अभिव्यक्ति है और वह समाज विकास नहीं करता जहां सृजनात्मकता की कमी रहती है।
उन्होंने भारतीय ज्ञानपीठ की तारीफ करते हुए कहा कि देश की सांस्कृतिक विरासत को साहित्य के माध्यम से समृद्ध किया है और विभिन्न भाषाओं के विकास में योगदान दिया है तथा पिछले चार दशकों से देश के बड़े लेखकों की कृतियों को सामने लाने का काम भी किया है। प्रधानमंत्री ने विभिन्न भाषाओं में कृतियों के अनुवाद पर भी बल दिया।
प्रेमचन्द के सपनों को पेश करेगी ‘लमही’ इससे पूर्व पुरस्कृत लेखक श्री राही ने कहा कि कश्मीरी भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे पुरानी आधुनिक भाषा है और उसका इतिहास करीब एक हजार साल पुराना है। लेकिन कुछ दशक पहले ही उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है।
उन्होंने कहा कि, “मैं इस बात से गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं कि इस भाषा का पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार मुझे मिल रहा है।” समारोह में चयन समिति के अध्यक्ष एवं उडिया के ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता लेखक सीताकांत महापात्र ने श्री राही के साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डाला और भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया ने धन्यवाद प्रकट किया।
इटली के छात्र टैगोर साहित्य पढ़ेंगे!