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11 जून 2009
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
आगरा। प्रेम की अमर यादगार ऐतिहासिक ताजमहल की बेमिसाल खूबसूरती को रोजाना उसके करीब कई शवों को जलाने जाने से खतरा है।
चिताओं से उठने वाला धुआं, लपटों और कालिख का सीधा असर इस प्रसिद्ध धरोहर पर पड़ रहा है। ताज के निकट स्थित शमशान भूमि में विद्युत शवदाह प्रणाली सालभर से खराब है।
इस विद्युत शवदाह प्रणाली का परिचालन आगरा विकास प्राधिकरण (एडीए) करता है। एडीए के पास इसकी मरम्मत के लिए धन नहीं है।
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इस श्मशान घाट का संचालन करने वाली क्षेत्र बजाजा समिति के अशोक गोयल कहते हैं, “इसमें दो विद्युत शवदाह प्रणालियां हैं जिनमें से एक का परिचालन एडीए करता है और दूसरे की देखभाल हम करते हैं। परंतु पिछले 17 महीनों से एडीए की शवदाह प्रणाली बंद है और इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है”।
एडीए अधिकारियों का कहना है कि इसकी मरम्मत के लिए उसके पास धन नहीं है। हालांकि आगरा आने वाले पर्यटकों से उसे हर वर्ष 40 से 50 करोड़ रुपये बतौर पथ कर मिलते हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता मुकेश जैन कहते हैं, “500 साल पुराना यह श्मशान घाट कई मायनों में अलग है। दुनिया में कोई भी शमशान गृह दो ऐतिहासिक धरोहरों के बीच नहीं है”।
गौरतलब है कि 1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने ताजमहल से शमशान घाट को दूर ले जाने का आदेश दिया था, लेकिन कुछ संगठनों के विरोध वजह से सरकार ऐसा करने में असफल रही।
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