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05 अक्टूबर 2009
वार्ता
भुवनेश्वर। उड़ीसा में निजी बस आपरेटरों की पांच दिनों से जारी अनिश्चितकालीन हडताल से पूरे राज्य की यातायात व्यवस्था चरमरा गई है।
नया टोल शुल्क हटाने की मांग को लेकर ऑल उड़ीसा प्राइवेट बस ओनर एसोसिएशन (एओपीबीए) की ओर से आहूत हडताल पहले केवल राष्ट्रीय राजमार्ग 5 और 5ए तक ही सीमित थी जो अब पूरे राज्य में फैल गई है। इससे लगभग पूरे राज्य में बस सेवाएं बुरी तरह अस्त- व्यस्त हो गयी हैं। हडताल के कारण 5000 से ज्यादा बसें सडकों पर नहीं आ रही हैं जिससे लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड रहा है।
राज्य सरकार और बस ऑपरेटरों के प्रतिनिधियों के बीच पिछले तीन दिनों के दौरान बातचीत के कई दौर विफल हो चुके हैं। दोनों पक्ष अपनी बात पर अडे हुए हैं। सरकार का मानना है कि बस आपरेटरों की मांग असंगत और अनुचित है। उसका तर्क है कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने पूरे देश में टोल शुल्क लगाया है और इसमें राज्य की कोई भूमिका नहीं है।
वहीं बस आपरेटरों का कहना है कि टोल शुल्क बहुत ज्यादा है और वे इसका बोझ नहीं उठा सकते इसलिए सरकार को इस राशि में से कम से कम 60 प्रतिशत वहन करना चाहिए। अनुमान है कि इससे राज्य सरकार को प्रतिवर्ष लगभग चार करोड रूपये खर्च करने पडेंगे।
हडताल के कारण जनता को हो रही परेशानी कम करने के लिए सरकार ने महत्वपूर्ण मार्गों पर अतिरिक्त बसें चलाई हैं तथा पूर्व तटीय रेलवे ने भी कुछ विशेष गाडियां सेवा में उतारी हैं। रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं क्योंकि उनके लिए अब यातायात का सबसे सस्ता साधन रेल ही रह गया है।
सरकार ने बस ऑपरेटरों से कहा है कि वे टोल से पडने वाले अनुमानित भार की गणना करके सरकार को भेजे ताकि सरकार बसों के किराए में उचित वृद्धि पर विचार कर सके. लेकिन बस ऑपरेटर किराया बढाने के लिए तैयार नहीं है. क्योंकि इससे उन्हें रेलवे के साथ प्रतिस्पर्धा में पिछडने का डर है। उनका कहना है कि किराए में बढोतरी के बजाय सरकार टोल शुल्क का भार वहन करे।
सूत्रों ने बताया कि यदि निजी बस ऑपरेटर अपने रुख पर अड़े रहते हैं तो आम जनता को इस संकट से उबारने के लिए सरकार बस मालिकों पर आवश्यक सेवा रख.रखाव अधिनियम (एस्मा) लागू कर सकती है।
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