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लकड़ी की तस्करी में सेना शामिल?
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21 नवम्बर 2007
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

जम्मू।
जम्मू में वन अधिकारियों और लकड़ी के ठेकेदारों ने आरोप लगाया है कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी गतिविधियों के लिए तैनात भारतीय सेना लकड़ी की तस्करी में संलिप्त है।

नाम गोपनीय रखने की शर्त पर दो वन अधिकारियों ने बताया कि पीर पंजाल क्षेत्र में तैनात राष्ट्रीय राइफल्स के जवान गैर-कानूनी रूप से पेड़ो को काट रहे हैं और सेना के ट्रकों से उन्हें उठा ले जा रहे हैं।

उनका कहना है कि बनिहाल, भदरवाह, डोडा, गंडोह, किश्तवार, रामबन, केशवान और सरथल जैसे इलाकों में जहां काफी घने जंगल हैं, पेड़ो की कटाई का काम चल रहा है। 11,500 वर्ग किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र के 25 प्रतिशत हिस्से में जंगल है जिसमें देवदार, कैल इत्यादि के पेड़ हैं।

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में पेड़ो की कटाई पर प्रतिबंध है और कुछ खास इलाके चिह्नित किए गए हैं जहां ठेकेदारों को पेड़ काटने की इजाजत है।

उन्होंने बताया कि देवदार के एक स्लीपर की स्थानीय बाजार में कीमत 5,000 रुपए है और कैल की कीमत 3,000 रुपए है। स्लीपर 6 से 12 फुट लकडी का टुकडा होता है।

राज्य वन निगम के एक अधिकृत ठेकेदार ने बताया कि सेना के लोग न केवल पेड़ काटते हैं बल्कि स्थानीय तस्करों के लिए कमीशन के आधार पर सेना के ट्रकों में उनकी लकड़ियां भी ढोते हैं। स्लीपरों की संख्या और जोखिम के आधार पर कमीशन तय होता है। यदि दस स्लीपर उठाए जाने हैं तो उसमें सेना का कमीशन दो स्लीपर होगा।

ठेकेदारों ने यह भी आरोप लगाया कि सेना आतंकवादियों के बारे में दी गई सूचना के एवज में मुखबिरों को लकड़ी के स्लीपर ही देती है। चूंकि सेना की गाडि़यों की जांच करने का अधिकार वन अधिकारियों के पास नहीं है इसलिए वे कुछ नहीं कर सकते और साथ में यह भी खतरा रहता है कि वे कब, किसे, किसी झूठे मामले में न फंसा दें।

16वीं कोर के एक सैन्य अधिकारी का कहना है कि हमें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। यदि ऐसा हमारी जानकारी में आता है और यह सही पाया जाता है तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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